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krishnashri


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दहेज़ नहीं मिला !!!

Posted On: 14 Dec, 2015  
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Junction Forum में

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आखिर धर्म निरपेक्ष कौन ????

Posted On: 22 Apr, 2014  
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Junction Forum में

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छोटे बाबू ::एक मशीन

Posted On: 26 Feb, 2013  
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मंगल कामना

Posted On: 16 Feb, 2013  
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माया ,मोदी ,मुलायम ,मनमोहन ,ममता की नीतियों का निहितार्थ

Posted On: 10 Feb, 2013  
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पतन की पराकाष्टा

Posted On: 19 Jan, 2013  
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चिंगारी बनी भीषण आग

Posted On: 31 Dec, 2012  
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आधी आबादी की मांग !!!

Posted On: 22 Dec, 2012  
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मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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आरक्षण ::कुछ जवाब खोजते अनुत्तरित प्रश्न

Posted On: 16 Dec, 2012  
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33 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय कृष्णश्री जी, बाहर वालों के अलावा, लड़की के घरवाले ही, उसके साथ जिस प्रकार का सौतेला और अपमानजनक व्यवहार करते हैं- सर्वप्रथम उसका इलाज किया जाना चाहिए. लड़कियों को शादी के बहाने 'निपटा' देने और परिवार से बेदखल कर देने का रवैया खत्म होना चाहिए. शादी के नाम पर, लड़के वालों के सामने, बार बार उसकी जो प्रदर्शनी होती है- नितांत अपमानजनक है. कभी उसे चला कर देखा जाता है, कभी बुलवाकर. अभी भी कुछ परिवारों में (खासकर ग्रामीण इलाकों में) उसकी शिक्षा से लेकर, खानपान तक में भेदभाव बरता जाता है. उसके ऊपर ढेरों नैतिक पाबंदियां थोप दी जाती हैं- जिसके बोझ तले दबकर, वह अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार( छेड़खानी, अभद्र टिप्पणियाँ आदि) की शिकायत करते हुए डरती है. इसके चलते ही शोहदों के हौसले बुलंद रहते हैं. बेटी को मजबूत बनाने के लिए, मां- बाप को, उसके प्रति लचीला और परिपक्व रुख अपनाना चाहिए. अफ़सोस- यहाँ नैतिकता और मर्यादा का जिम्मा तो अकेले नारी जाति का ही है; पुरुष छुट्टे सांड की तरह, मंडराते हुए कुछ भी करता फिरे- कोई देखने सुनने वाला नहीं. संवेदनाहीन लोग बसों, सड़कों, बाजारों में लड़कियों पर होने वाले अनाचार को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं. क्या नागरिकों की, समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? गुंडों को पकडवाने के लिए, सरकार की तरफ से इनाम रखा जाना चाहिए और स्रियों की रक्षा करने वाले को सम्मानित किया जाना चाहिए; जिससे खुलेआम छींटाकशी और छेड़खानी पर रोक लग सके. इसके अलावा कार्यालयों/ शिक्षण संस्थानों में भी, महिलाओं पर की जाने वाली अश्लील- अभद्र टिप्पणियों पर रोक लगनी चाहिए. एक समयोचित प्रश्न को उठाती हुई सार्थक, विचारणीय पोस्ट हेतु आभार.

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

छोटे शहर से आई, खुशियाँ तमाम छाई , स्कुल से कालेज तक जारी रही पढ़ाई / . काली उस रात को , अश्रु की बरसात को , कैसे भुलाऊं अम्मा भेड़ियों की बात को / . तार -तार आँचल में , घर के उस सांकल में , कैसे धकुं मैं तन मम्मी के आँचल में आखिर में आपने लिखा की मैं नव वर्ष नहीं मन रहा हूँ , मैं भी नहीं मना रहा हूँ इसलिए सिर्फ लोगों की शुभकामनाएं स्वीकार कर रहा हूँ , दे नहीं रहा हूँ ! अब आते हैं आपके विषय पर ! आपने एक आम लड़की की पीड़ा को लिखा है , लोग हमें नाली का कीड़ा कहते हैं ! हम हैं भी ! कोई दोराय नहीं ! लेकिन यही कीड़े चुनाव के समय "भगवान् ' हो जाते हैं ! अब इस भगवान् को ये सोचना होगा की भारत किस किस के लिए है ? सिर्फ उनके लिए या हमारे लिए भी ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय वर्मा जी , सादर ,आपने अपनी विस्तृत प्रतिक्रया दी ,इसके लिए मैं आभार व्यक्त करता हूँ . मेरी अंग्रेजी उतनी अच्छी नहीं है . आपने पूछा है कि किसने हिन्दू समाज को बांटा , किसने जाति बनाई , इत्यादि ,इत्यादि . आपको पूछने का हक़ है . इससे सम्बंधित मैंने एक ब्लॉग लिखा था जिसका उल्लेख इस ब्लॉग में भी है .कृपया एक बार दृष्टिपात करने कि कृपा करें मैं कृतार्थ होउंगा . पुराने समय में समाज को चलाने के लिए कार्य विभाजन कर किया गया , मेरे विचार से इस प्रकार जातियां बनती गई . मेरा यही प्रश्न है कि जाति प्रथा का बहुत विरोध किया जाता है फिर उसे बनाए रखने के लिए जातिगत आरक्षण क्यों ?जैसाआपने भी "पुअर " की हिमायत की है .गरीब की कोई जाति नहीं होती है , केवल भूख उसकी जाति होती है . जिस दिन जाति प्रथा टूटेगी समाज की बहुत सी गन्दगी स्वमेव साफ हो जायेगी . जो उस समय गलत था आज उसे बनाए रखने का प्रयास क्यों किया जा रहा है .उसे सही साबित करने का प्रयास क्यों किया जा रहा है ? आप विद्वान हैं स्वयं सोचे . क्या यह उचित है ? ब्लॉग पर प्रथम बार पधारने के लिए धन्यवाद .कृपा बनाए रक्खें , पुनः धन्यवाद .

के द्वारा: krishnashri krishnashri

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सादर नमस्कार ........ये समाचार हमने भी देखा ..क्या आपको कहीं पुलिस बल की कमी नज़र आई ?लेकिन सुरक्षा व्यवस्था के लिए सरकार पुलिस बल कम होने का रोना रोटी नज़र आती है !यहाँ पुलिस पूरी तरह संवेदनहीन नज़र आ रही है शायद ये इन्हें सरकार की तरफ से उपहार में मिली है जिसे वो ओढना जरुरी समझते है !जब एक पुलिस कर्मी किसी महिला पर लाठी चलता है तो उसे शायद एक पल के लिए भी अपने परिवार की महिलाओ और बच्चियों का ख्याल नहीं आता होगा ,आता तो जरुर उसके हाथ कांप जाते ! संसद का विशेष सत्र बुलाने से साफ इंकार कर दिया गया है !प्रधानमंत्री का ये बयान की रेप में फांसी का प्रावधान नहीं है ,दुखद प्रतीत हुआ !कानूनी प्रक्रिया बेहद पेचीदा है पर इन हालत में किन सबूतों की जरुरत बाकी है ?विशेष अदालते ,विशेष कानून किसके लिए बने है ?सभी समय और परिस्थितियों की धकेलने में लगे है

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय कृष्ण सर, सादर प्रणाम सर्वप्रथम सर एक बात कहना चाहूँगा की आपकी लेखन शैली का मैं अपने जे जे पर आरम्भ से ही मुरीद रहा हूँ तथा कुछ सिखने की कोशिश करता रहा हूँ................... आरक्षण एक समस्या है और इसकी सबसे अजीब और सजीव तथ्य यह है की हम सभी जानते हैं की यह एक समस्या है.............जिन्हें मिल रहा है वह भी जिन्हें नहीं मिल रहा वह भी, किन्तु कुछ राजनीतिक रोटियां सेक रहें हैं तो कुछ अपनी मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं वास्तविकता यह है की यदि दोषपूर्ण रूप से आप समाज को आपस में बाँट कर रखेंगे तो धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द अपने अर्थों को परिभाषित करने की मांग करेंगे ही.......... आरक्षण को आरक्षण के रूप में ही रहने देना चाहिए जिन्हें मिलना चाहिए था वो आजभी अभाव में हैं ..................और जिन्हें नहीं मिलना चाहिए उसे खुलेआम मिल रहा है इन सबों में वास्तविक दुर्गति उन छात्रों की हो रही है जो सरकारी नौकरियों में अपनी भविष्य को तलासते हैं सुन्दर और सार्थक लेख सर......

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: krishnashri krishnashri

आदरणीय महोदय, सादर अभिवादन! आपने बहुत अच्छी रचना पेश की है! सुषमा जी और अरुण जेटली जी भी विस्तार से संसद को समझाया था, मुलायम भी मुलायम भाषा में दोतरफा बात कह गए थे ... पर हुआ क्या ???? हम तो यही कहते हैं जिस दिन संसद में हंगाम हो संसद ठप्प हो उस दिन का भत्ता काट लिया जाय! पर इसे लागू कौन करेगा? लोकपाल कौन और क्यों बनाएगा? जब हम विकल्प नहीं पैदा कर पा रहे हैं तो रोने से क्या फायदा? जरूरत है सफल विकल्प की मजबूत विपक्ष की ... बिकने वाले नेता की नहीं जरूरत है पर यहाँ थोक के भाव में ऐसे ही नेता तैयर हो रहे हैं ... उन्हें जीताता कौन है? हम ही लोग न! फिर ... सर जी, जरूरत है मजबूत विकल्प पैदा करने की! जरूरत है अच्छे और इमानदार लोगों के राजनीति में आने की! जब तक विकल्प नहीं उभरेगा हम कांग्रेस की मनमानी झेलने को विवश रहेंगे! आभार सहित!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: krishnashri krishnashri

जनसंख्या बढाओ, वोट दो , हमें सत्ता दो हम तुम्हारा कर्ज माफ करेगें . वर्त्तमान समय में सभी पार्टियों का यही नारा हो गया है. बहुत सुन्दर आलेख आदरणीय श्री कृष्णाश्री जी, आवश्यकता देश में हर समाज को देशहित में जनसंख्या नियंत्रण कानून के आधीन लाने की है किन्तु सरकार सबसे सब्सिडी के सिलेंडर छीनकर खुश है. आज आवश्यकता कृषिभूमि को बचाने कि है मगर उद्योगपतियों कि सरकार नए नए सेज क्षेत्र बनाकर खुश नजर आ रही है. आज आवश्यकता देश में गरीबी कम करने कि है तो सरकार देश में बढ़ रहे अरबपतियों कि संख्या से गौरवान्वित महसूस कर रही है. इस देश में मूल समस्या के लिए लड़ने वाली सरकार अभी तो कोई नहीं है.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: Lahar Lahar

अब प्रश्न उठता है कि आखिर काला धन है क्या , जिसको लेकर इतनी हाय तौबा मची हुयी है . मोटे तौर पर वह लुटा हुआ , कमाया हुआ ऐसा पैसा जिस पर नियम से सरकारी डेय को न दिया गया हो . हम आप सभी किसी न किसी रूप में काला धन का निर्माण करते हैं या निर्माण होने में सहयोग करते हैं . जब आप बाज़ार में कुछ भी खरीदने जाते हैं तो दूकान दार से बिल या कैशमेमो नहीं लेते . सामान लेते हैं और पैसा देते हैं . दुकानदार कहता है कि बिल लीजिएगा तो वैट देना पडेगा , हम पीछे हट जाते हैं . यहीं से काला धन का निर्माण प्रारंभ हो जाता है , भले ही वह छोटे रूप में ही क्यों न हो .इसी तरह ट्रांसफर , पोस्टिंग ,ठिका लेने देने में , नियम बनाने में भ्रष्टाचार किया जा सकता है . जो पैसा देकर ट्रांसफर -पोस्टिंग कराएगा वह अपनी नौकरी के दौरान उस पैसे को निकालने का भी प्रयास करेगा ही .बस यहीं से छोटे भ्रष्टाचार से बड़े भ्रष्टाचार का पहिया घूमने लगता है और काला धन का निर्माण प्रारम्भ हो जाता है . छोटे लोग यदि करते हैं तो वह देश में ही रहता है .इसकी जांच के लिए प्रांतीय तथा केन्द्रीय सरकार कि तमाम एजेंसियां हैं ,जो समय समय पर जांच करती रहती हैं . और लगाम लगाती हैं परन्तु बड़े बड़े भ्रष्टाचार , व्यापार से निर्मित काला धन विदेशों में जमा करा दिया जाता है . इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि वहां देश कि सरकार कोई जांच नहीं कर सकती . कृष्णजी........सटीक विवेचन....

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम राजनीति की बेहयाई सब सीमा तोड़ चुकी है ,...,..निःसंदेह हमारी कमियों का लाभ सदैव चोर लुटेरों ने उठाया है ,..आज का व्यापारी या हम चोर हैं तो इसके मूल में कर जाल है ,..व्यापार का अर्थ ही लाभ कमाना है ,..".चोरी से ज्यादा मिलता है तो ज्यादा सही ,..कौन सा हरिश्चंद्र बनकर हम काशी के राजा होंगे और राजा रजवाड़े ही तो लूटते हैं ,..अब लोकतंत्र की चाशनी लगाकर खाते हैं ,.." .हमें अपनी यह मानसिकता छोडनी होगी एकजुटता ही उत्थान का रास्ता है ,...हमारे पास अफ़सोस करने का वक्त नहीं है ,...हमें सोच समझकर निर्णय ही नहीं लेना है उसे मूर्त रूप देकर देश को साफ़ सुथरा करना है ,.......सुन्दर पोस्ट के लिए ह्रदय से आभार और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ,...श्रीहरि और लक्ष्मी माता हमें ज्ञान भक्ति और शक्ति से पोषित करें ...सादर

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय श्री जी सादर नमस्कार, आपका यह आलेख मुझे आपके पिछले आलेखों से कुछ कमजोर सा प्रतीत हुआ. मुझे आपके आलेख की प्रथम पंक्ति पर ही आश्चर्य हुआ की आपने "सरकार कोई स्वरूप नहीं होती" लिख कर इसे अधूरा लगने वाला वाक्य बना दिया.कई मुद्दों पर अधूरापन और किसी पर आपकी ही विरोधाभासी टिपण्णी ने थोड़ा निराश किया.हाँ लाबिंग का आपने अच्छा मुद्दा उठाया है किन्तु यह अधूरा इस मान से है की इनके पीछे न सिर्फ वरद हस्त है बल्कि आज सरकार में शामिल सारे प्रतिनिधि कहीं ना कहीं पिछले दरवाजे से देश के प्रतिष्ठित उद्योगों से जुड़े हैं या ये कहें की गुप्त रूप से उद्योगपति ही हैं तो गलत नहीं लगता. सब्सीडी पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता को आपके आलेख से बल मिलता है. पेट्रोल पर सब्सीडी की जहां तक बात है शायद यह सरकार का जनता में फैलाया गया भ्रम है. क्योंकि सरकार जितनी सब्सीडी दे रही है उससे अधिक टैक्स द्वारा वसूल रही है. रोजमर्रा की जिंदगी में उपयोग होने वाली शायद ही कोई वस्तु हो जिस पर सरकार इतना अधिक टैक्स वसूलती हो.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

क्रिष्णाश्री भाई नमस्ते सबसिडी की बात की जाती है क्या वो वाकई मैं है ? या फिर प्रजा की आंख में डालने की धूल ही मात्र है । ये एक तेल कंपनी का नफा-नूकसान का हिसाब है । २००७ से २०११ तक का सालाना हिसाब । ईस हिसाब में ईन्कम साईड में कुल ५ ऍन्ट्री है । Sales Turnover Excise Duty Net Sales Other Income Stock Adjustments सेल्स टर्नओवर में सबसिडी नही हो सकती । नेट सेल में भी नही हो सकती । अधर इन्कम में हो सकती थी लेकिन २००९ में आंकडा माईनस है और सबसिडी मायनस नही हो सकती तो यहां भी सबसिडी नही हो सकती । स्टोक ऍजस्ट्मेन्ट तो कंपनी और शेरधारक का अंदरूनी मामला है । ऍक्साईज ड्युटी एक आम आदमी को समजमे ना आये ऐसी चीज है । जो मै भी नही समज सकता । अक्सर ड्युटी को टेक्ष ही कहा जाता है और ये इन्कम साईड में हो ही नही सकती । यही एक ड्युटी है जो इन्कम करवाती है और वो भी तगडा इन्कम । शायद ईस में सबसिडी हो सकती है । अगर ऍक्साईज ड्युटी अपने आप ही एक स्वतन्त्र चीज है तो सबसिडी उसमें भी नही हो सकती । तो बीना सबसिडी के कंपनी कितना कमा लेती है आप देख सकते हैं । Profit & Loss account of Bharat Petroleum Corporation ------------------- in Rs. Cr. ------------------- Mar '11 Mar '10 Mar '09 Mar '08 Mar '07 Income Sales Turnover 163,218.36 131,499.81 145,392.07 121,684.07 107,452.27 Excise Duty 12,380.03 11,282.73 11,318.64 11,475.94 10,895.42 Net Sales 150,838.33 120,217.08 134,073.43 110,208.13 96,556.85 Other Income 1,321.04 1,190.10 -298.74 1,091.63 550.99 Stock Adjustments 2,056.05 3,989.85 -1,575.88 -392.50 205.45 Total Income 154,215.42 125,397.03 132,198.81 110,907.26 97,313.29 Expenditure Raw Materials 141,028.03 113,884.03 121,991.29 101,743.99 88,745.19 Power & Fuel Cost 475.89 237.12 67.17 61.75 66.64 Employee Cost 2,802.85 2,141.12 1,884.88 1,297.21 1,003.70 Other Manufacturing Expenses 410.13 384.72 347.09 229.54 243.43 Selling and Admin Expenses 3,331.54 3,186.95 2,870.03 2,508.57 2,365.31 Miscellaneous Expenses 1,335.33 888.34 796.46 823.61 620.23 Preoperative Exp Capitalised 0.00 0.00 0.00 0.00 0.00 Total Expenses 149,383.77 120,722.28 127,956.92 106,664.67 93,044.50 --

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय कृष्ण सर, सादर प्रणाम किसी कारण से आपका यह लेख नहीं पढ़ पाया था विरोध एक ऐसी सकारात्मक वस्तु है जिसका सदुपयोग करना सब के बस की बात नहीं .........आज भारत में इतनी अराजकता फैलने का मुख्य कारण भी यही है की किसी को विरोध करने की असली भाषा ज्ञात नहीं है..........................पार्टियों को विपक्षी की हर बात का विरोध है ........जिन्हें जो करना चाहिए वो सकारात्मक हो अथवा ना हो सामने वाले का विरोध करना है बस यही मानसिकता बन रही है...........निश्चचय ही विरोध होना चाहिए और जैसा की आपने लिखा यदि विरोध हो तो विकल्प भी हो ........अविकल्पीय विरोध बस व्यर्थ का प्रलाप बन कर रह जाता है ...........मेरे मत से लोकपाल पर जो विरोध हो रहा है उसमें तो थोड़ा विकल्प साफ़ नजर आता है किन्तु काले धन के मसले पर बाबा जी का विरोध में कोई रास्ता नहीं दिख रहा है ...........जब की उनको एक पूर्ण प्रणाली लोगों के सामने रखनी चाहिय थी............अन्यथा सिर्फ विरोध करने से ही जनकल्याण नहीं होगा...........बहुत ही सार्थक लेख आपका सर

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

विरोध मर्यादा में ,नीतिगत नियमों के अंतर्गत , सामाजिक परिवेश को सुदृढ़ करने हेतु , मानवता के हित में हो . धरातल से जुडा विरोध सदैव से ही हितकारी रहा है और हितकारी रहेगा भी .हम केवल आज का ही देख कर ही कोई भी विरोध करते हैं , परन्तु दीर्घकाल में उसका क्या असर होगा इस तरफ हमारा ध्यान नहीं रहता . शक्ति प्रदर्शन ही अब विरोध का एक मात्र अस्त्र रह गया है . विद्वत जन तो अब मुखर होते ही नहीं . आदरणीय कृष्ण श्री जी बहुत सुन्दर बातें कही आप ने ..काश शांत और शान्ति को सरकार समझे मौन को व्रत को जाने माने तो लोग ये तूफ़ान अपने सर पर ना उठायें ...लोग ये विध्वंसक रुख अपना के अपनी ही क्षति करते हैं और खुद भरपाई भी ...लेकिन मरता क्या ना करता वाली हाल ..कुछ अन्यायी उसमे शामिल हो और हुडदंग कर डालते हैं ..ऐसा न हो तो आनंद और आये .... भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

जब अमिताभ जी ने ''दो बूँद जिंदगी की'' का नारा दिया था..तब उनका भी विरोध हुआ था...क्योंकि आज सारी दुनिया को पता है कि भारत में एक भी पोलियोग्रस्त बच्चा नहीं है....आम आदमी तो कभी इन पचड़ों में पड़ता ही नहीं.... दूसरे शब्दों में कहा जाये तो पता नहीं....इसे विकृत सोच कहें या...सोची समझी साजिश.....छोटी से छोटी बात का विरोध आये दिन शुरू हो जाता है....विरोध करने वालों में कईयों को ये भी पता नहीं होता कि वो किस बात का विरोध कर रहें हैं...किन्तु वाह री उनकी निराली मानसिकता....उनका सिर्फ और सिर्फ मकसद तो दंगा-फसाद और तोड़-फोड़-आगजनी तक ही सीमित होता है.....ताकि वे इस देश का, देश वासियों का ज्यादा से ज्यादा नुक्सान कर सकें.....और कृष्ण श्री जी आप माने या न माने....कहीं ना कहीं...किसी ना किसी रूप में इन सब विरोध करने वालों के सर पर इस देश के ओछी मानसिकता वाले लीडरों का वरदहस्त ही होता है...... विचारणीय विषय........सादर...

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

सादर प्रणाम! "यदि आप कुछ कहते हैं तो कहा जाता है कि संसद का अपमान किया जा रहा है .जबकि सीधे प्रसारण को इन्हें दिखा कर पूछने का समय आ गया है कि वहां वे क्या कर रहे थे ?यह भी विरोध का एक तरीका हो सकता है . कन्या भ्रूण ह्त्या का खुल कर विरोध या समर्थन नहीं किया जा रहा है .परन्तु आमिर खान के पारिश्रमिक को लेकर बवाल किया जा रहा है और कन्या भ्रूण ह्त्या को अप्रत्यक्ष समर्थन देने का प्रयास हो रहा है. अरे इस बात पर खुश तो होइए कि इस मुद्दे पर बोलने वाला तो कोई हुआ जिसकी आवाज का कोई महत्त्व तो है .परन्तु लोग बाग़ तो नफा नुकसान देखने में लगे हुए . विरोध सकारात्मक हो तो उसके क्या कहने . नए नए विचार , नई नई बातें सामने आती रहती हैं , समाज बदलता रहता है .अव्यवहारिक बातों का ,सोचों का, कार्य प्रणालियों का खंडन मंडन होता रहता है . विवेक शील समाज उसे धारण कर आगे बढ़ता रहता है , परन्तु शर्त यह है कि विरोध मर्यादा में ,नीतिगत नियमों के अंतर्गत , सामाजिक परिवेश को सुदृढ़ करने हेतु , मानवता के हित में हो . धरातल से जुडा विरोध सदैव से ही हितकारी रहा है और हितकारी रहेगा भी .हम केवल आज का ही देख कर ही कोई भी विरोध करते हैं , परन्तु दीर्घकाल में उसका क्या असर होगा इस तरफ हमारा ध्यान नहीं रहता...." हार्दिक आभार.....!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: krishnashri krishnashri

के द्वारा: krishnashri krishnashri

कन्या के जन्म से ही माँ बाप दहशत में आ जाते हैं, आगे आने वाली विपत्ति से डर कर . हर क्षण हर पल दहशतजदा , बेटी ठीक से कालेज पहुंची तो होगी ,अब आ रही होगी ,अभी तक पहुंची क्यों नहीं , सब ठीक तो होगा ,जैसे सवाल हर माँ के दिमाग में कौंधते रहते हैं . यह किस स्थिति का परिचायक है ? आज मिसाइल प्रोजेक्ट की प्रमुख एक महिला है .जिसने विश्व में भारत का नाम रौशन किया .यह सभी भारतीयों के लिए गर्व का विषय है .हम फुले नहीं समा रहे परन्तु घटता लिंगानुपात हमें ठेंगा दिखा रहा है . आदरणीय श्री कृष्ण जी , स्वाभाविक सवाल उठाये हैं आपने ! समाज इतना कुल्सित हो गया है की बेटी के जन्म से ही चिंता का भाव आ जाता है ! लेकिन सिर्फ इस वज़ह से ही तो बेटी को पैदा होने से नहीं रोका जा सकय है ! आपके सवाल बहुत सटीक हैं , लेकिन जवाब मिलेगा ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्रिय पाठक जी , मेरे ब्लॉग पर प्रथम आगमन पर आपका हार्दिक स्वागत है . आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इस मंच पर अलग अलग विचार धारा के लोग विराजमान हैं .मैंने एक बात में साम्यता देखी है , सभी एक दुसरे का बहुत सम्मान करते हुए अपनी बात रखते और पूछते हैं .आपने जो प्रथम प्रश्न पूछा है वह बहुत लंबा है संक्षेप में कह सकते हैं कि मुस्लिम आक्रान्ताओं के आने के बाद इस प्रथा का प्रादुर्भाव लड़कियों को बचाने के उद्देश्य से हुआ जो बाद में प्रथा के रूप में विकसित हो गया .आपका दूसरा प्रश्न मेरी समझ में नहीं आ रहा . प्रौढ़ और वयस्क विवाह धर्म सम्मत ,न्याय सम्मत एवं विज्ञान सम्मत मेरे विचार से है .अपनी कम बुद्धि के कारण मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इससे कौन सी बुराई आ रही है .यदि आप इस बात से इतना ही उद्विग्न हैं तो इस विषय पर अपना एक ब्लॉग पोस्ट करिए , विद्वत जन अपने विचार जरुर रखेंगे . प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

के द्वारा: krishnashri krishnashri

आदरणीय श्री कृशन श्री जी धृष्टता पूर्वक न छाहते हुए भी सार्थक या निरर्थक विचार प्रकट कर रहा हूँ. बाल विवाह एवं प्रतिबंधित विधवा विवाह नामक कुप्रथा का अवतार किन परिस्थितियों में हुआ? बाल विवाह के दुष्परिणाम तों इतने गिना दिये गये कि इस पर सरकारी विधान भी बन गया. किन्तु प्रौढ़ या वयस्क विवाह से फ़ैली घृणित एवं सम्वेदनात्मक संबंधो को विकृत करने वाली बुराईयों से हम जान बूझ कर आँख क्यों बन्द कर रहे है? ज़रा कोई व्यक्ति शपथ पूर्वक अपने दिल पर हाथ रख कर कहे कि बाल विवाह से फ़ैली बुराई समाज के विकाश लिये ज्यादा घातक है या वयस्क या प्रौढ़ विवाह से उत्पन्न खोखले समाज सुधार क़ी चादर ओढ़े बुराईयाँ घातक है. आदरणीय श्री जी, यदि समस्या अनुचित हो तों आप क्षमा करेगें. प्रकाश

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

आदरणीय कृष्णश्री जी, आपके ब्लॉग तक संभवतः प्रथम बार आ रहा हूँ, सच तो यह है कि अपने लेख पर आपकी प्रतिक्रिया से मात्र कौतूहलवश क्लिक करके यहाँ तक आ गया क्योंकि आप मुझे नए पाठक लगे| फिर आपका लेख लेख पढ़ा तो शब्दों व भावों की सरलता देखकर प्रतिक्रिया देने का मन भी हो आया..!!! छात्र जीवन के कारण बहुत समय jj पर नहीं दे पाता हूँ, केवल अवकाश के दिनों में ही कभी-कभार यहाँ तक आना होता है| किन्हीं अत्यावश्यक प्रतीत होने वाले विषयों पर ही लिखता हूँ, प्रतिक्रियायों के मार-पीट से दूर रहने के कारण बहुत अधिक लेखकों से परिचय करने का भी अवसर नहीं मिला! आपने विषयों-बिन्दुओं को बहुत ही सरल व सार्थक तरीके से उठाया है आशा है कि इससे इस मंच को एक नई दिशा मिलेगी! निश्चित रूप से यदि लेखकगण प्रतिक्रियायों की गिनती के आधार पर अपने लेखों की गुणवत्ता व अपनी योग्यता मापना बंद कर दें तो उन्हें अपने वैचारिक क्षेत्र को विस्तार देने में विशद सहायता मिलेगी! ...साभार!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय कृष्ण सर , सादर नमस्कार, आपकी हर बात से पुर्णतः सहमत हूँ ...रामदेव जी का जो प्रभाव आम जन पे है...और जिस तरह योग और आयुर्वेद को सदियों से वंचित आम जन तक पहुचाया है उसके लिए भारतीय समाज को उनका ऋणी रहेगा....वर्तमान सरकार जिस तरह से अपने स्वार्थ के लिए उनका मान मर्दन कर रही है ..और उनका और अन्ना जी का मनोबल गिराने और मुद्दे से भटकाने की कोशिश में सफल हो रही है...ये बड़े ही दुर्भाग्य की बात है....पर तीसरा अध्याय पूरा होगा...क्योंकि जनता भटकी जरुर है पर सरकार के दावपेच और कलुषित मानसिकता को भी फिर से धीरे धीरे समझने लगी है...अतः मंजिल दूर नजर आ रहा है पर सफ़र पूरा जरुर होगा....धीरे धीरे ही सही ....आपको बहुत -२ बधाई यथार्थ को सामने रख वर्तमान व्यवस्था और आदोलन की वस्तु स्थिति के हरेक बिन्दुओ को छु कर हम सबको जागृत करने के लिए.......

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

आदरणीय कृष्ण श्री जी, सादर ! बहुत सारगर्भित विचार ! ट्रेन का उदाहरण आपने अच्छा दिया, बहुत सटीक है ! "बहुत से लेखों में समाज के विकास के लिए कुछ मौलिक सुझाव होते हैं परन्तु वे केवल मंच के पाठकों तक ही सीमित होकर रह जाते हैं .समाज के हित के लिए उनका उपयोग नहीं हो पाता .मेरे विचार में जागरण जंक्शन सम्पादक मंडल को उन लेखों, सुझावों को सम्बंधित विभागों / सरकारों को भेजने में रूचि दिखानी चाहिए , जिससे समाज हित में उस श्रम का उचित उपयोग हो सके .इससे मंच की प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी और मंच के सुधि लेखक और प्रखरता से अपनी बात को कहने का साहस कर सकेगें ."" बहुत सुन्दर विचार ! मैं आपकी बात का ह्रदय से समर्थन करता हूँ ! आभार !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: krishnashri krishnashri

पुराने जमाने में राजा जनता के वास्तविक हालात जानने के लिए भेष बदल कर निकला करते थे . जनता में घुल -मिल कर उनके दुःख -दर्द को जानने का प्रयास करते थे .अब वे हालात नहीं हैं और नहीं वैसा समय ही है .होने वाले मुख्यमंत्री को केवल अपने चाटुकारों और दरबारियों के भरोसे ही नहीं रहना चाहिए . अब संवाद का सबसे अच्छा साधन इलेक्ट्रानिक मीडिया हो गया है .कम से कम प्रत्येक सप्ताह अपनी सरकार की नीतियों , उपलब्धियों का विवरण जे जे जैसे किसी भी मंच पर देना चाहिए , जिससे जनता अपना दुःख -दर्द सीधे उनसे बयान कर सके .उन्हें भी पता चल सके कि उनके प्रतिनिधि जनता के साथ क्या- क्या कर रहे हैं . पिछली सरकार की तरह संवाद हीनता की स्थिति न बनी रहे . मैं होता तो ऐसा ही करता. बधाई. आदरणीय महोदय जी, सादर अभिवादन के साथ.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: krishnashri krishnashri