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हम सिद्धांत नहीं मानते !!!

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स्थानीय बाज़ार में मुद्रा की कमी को दूर करने का एक आसान तरीका है कि कुछ चुने हुए क्षेत्रों को विदेशी निवेशकों के लिए खोल दिया जाय . इसका परिणाम होता है कि विदेशी निवेशक उन चुने हुए क्षेत्रों में निवेश करने लगते हैं . मुद्रा का प्रवाह उन क्षेत्रों में होने लगता है . पूंजी कि कमी दूर होती है .दूसरा कारण है कि टेक्नालाजी को आकर्षित करने के लिए कुछ चुने हुए क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोला जाता है . लाभ कि प्रत्याशा में विदेशी निवेशक टेक्नालाजी सहित आकर्षित होता है . कभी कभी स्किल्ड लेबर की कमी को दूर करने के लिए भी विदेशी निवेश को आकर्षित किया जाता है . दुरूह परिस्थितियों में कच्चे माल की कमी को दूर करने के लिए भी विदेशी निवेश को आमंत्रित किया जाता है . उपरोक्त परिस्थितियों में दोनों देशों को फ़ायदा होता है . व्यापार बढ़ता है . अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव का विकास होता है .
भारत में सत्ता रुढ़ दल यफ .डी .आई . लाने के लिए बुरी तरह अणा हुआ है . आज देश की स्थिति यह है कि देश में मुद्रा का प्रवाह जरुरत से ज्यादा हो रहा है .मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है . मुद्रा स्फीति की दर बढ़ रही है . यफ.डी.आई.लागु होने पर मुद्रा स्फीति के और बढ़ने की संभावना बनी रहेगी . लेकिन यहाँ तो स्थिति यह है कि जो हमने कह दिया वही कानून है . अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांत से कुछ लेना देना नहीं है . नई परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं , और देश गर्त में जा रहा है . उन्हें केवल नंबर की चिंता है . कैसे येन केन प्रकारेण नंबर पूरा किया जा सके . आयात- निर्यात में अंतर बढ़ रहा है . विदेशी मुद्रा की देनदारियां बढ़ रही है . आगे मुद्रा का और अवमूल्यन होने की संभावना बन रही है . भुगतान संतुलन बिगढ़ रहा है . परन्तु यहाँ तो जो हमने कह दिया वही कानून है . कैसे नहीं बनेगा , इसी में समस्त ऊर्जा का अपव्यय किया जा रहा है .
टेक्नालाजी का हस्तानांतरण विदेशी व्यापार में एक अहम् स्थान रखता है . यहाँ यह सोचने की बात है कि खुदरा व्यापार में टेक्नालाजी का क्या स्थान है ?भारतीय अर्थव्यवस्था में शुद्ध देशी टेक्नालाजी का ही अहम् स्थान हो सकता है . जब यह पुरे विश्व में धराशायी हो गई हो तो फिर भारत में उसका क्या स्थान हो सकता है ? आज विश्व में जिन दवाइयों के उत्पादन ,वितरण पर प्रतिबन्ध है उन्हें हम थोक में उत्पादित और वितरित कर रहें हैं यही यफ. डी. आई .के भी साथ हो रहा है , यह सोचने की बात है . आज विश्व में भारतीय श्रमिक बाज़ार का एक अच्छा खासा स्थान है . बढ़ी बढ़ी विदेशी कम्पनियां भारतीय श्रमिक बाज़ार का उपयोग कर रहीं हैं . और लाभ की स्थिति उत्पन्न कर रही हैं . विदेशी , खुदरा बाज़ार में जब प्रवेश करेंगे तो स्थानीय बाज़ार के कच्चे माल को ही बेचेगें . क्या भारतीयों को अपना माल बेचने की योग्यता नहीं है ?
विदेशी किराना जब बाज़ार में प्रवेश करेगा तब अपने काउंटर पर माल रखने हेतु उसकी मनमानी कीमत निर्धारित करेगा . बस यहीं से एकाधिकार की स्थिति उत्पन्न होगी . इसका परिणाम यह होगा कि स्थानीय उत्पादक को उनकी नाजायज मांग को भी मानने के लिए मजबूर होना पणेगा , यदि उसे अपना उत्पादित माल बेचना है तो . आगे कि स्थिति और भी भयानक होगी . उत्पादन पर भी उनकी मर्जी चलेगी . उत्पादक उसी माल का उत्पादन करेगा जिसके उत्पादन कि उनकी इच्छा होगी .पारंपरिक खेती की रीढ़ धीरे धीरे टूट जायेगी . यफ . डी आई .किसी भी रूप में , वर्त्तमान परिस्थितियों में , भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हित कर नहीं है वरन यह अर्थव्यवस्था को किसी न किसी रूप में कुछ नुकसान ही पहुंचाएगी . यह कितना होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा .
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निर्वाचन आयोग हर वह प्रयास कर रहा है जिससे सभी मतदाता अपने -अपने वोट का समुचित प्रयोग कर सकें . मतदान प्रतिशत बढाने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है . यहाँ यह बात भी उठ रही है कि वोट करना अनिवार्य कर दिया जाय .जो वोट न डाले उसको सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाय . परन्तु देश कि सबसे बढ़ी संसद में क्या हो रहा है ?आखिर हमारे चुने हुए प्रतिनिधि कौन सा उदाहरण प्रस्तुत कर रहें हैं ? भाषण तो पक्ष -विपक्ष में दिया जा रहा है और वोट देने के समय अप्रत्यक्ष सहयोग देते हुए , मतदान नहीं किया जा रहा है . इनके विरुद्ध संसद क्या कार्यवाही करेगी ? आखिर आप किसी बात से सहमत हो सकते हैं या असहमत हो सकते हैं परन्तु दोनों में से कुछ न हों ऐसी कौन सी स्थिति है ? क्यों नहीं उनके उस दिन के भत्ते काट लिए जाय ?संसद वोट देने को क्यों नहीं अनिवार्य कर रही है ?काम नहीं तो दाम नहीं . दिन भर पूरा देश नुरा कुश्ती देख रहा था और परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात . इस स्थिति पर लगाम कौन लगाएगा ?याद रखिये ” प्रजातंत्र ” की ऐसी दुर्दशा . २०१४ आने वाला है . कमसे कम आप तो वहिष्कार मत करिएगा .सोचिये ,समझिये , देखिये फिर लगाइए , इनकी तरह भागिए मत .

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
December 13, 2012

आदरणीय श्री जी                       सादर, आपकी बातों से अवश्य ही सहमत हूँ. एक मोटा विदेशी निवेश खुदरा बाजार की दिशा ही बदल देगा और कृषि क्षेत्र को चौपट कर देगा. लम्बे समय में इसके घातक परिणाम होंगे. सादर.

    krishnashri के द्वारा
    December 14, 2012

    आदरणीय रक्ताले जी , सादर ,सहमति व्यक्त करने के लिए धन्यवाद .

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 12, 2012

आदरणीय कृष्ण श्री जी , सादर अभिवादन !….. लगता है पूरे देश की जनता जड़ और संवेदनशून्य हो गई है , देश में क्या हो रहा है और देश किस गर्त में जा रहा है ? इससे उसे कुछ लेना-देना नहीं ! हाँ …. पर जब समय आयेगा तो वोट वह अपनी जाति के लोगों को ही देगा ! हार्दिक आभार !!

    krishnashri के द्वारा
    December 12, 2012

    आदरणीय आचार्य जी , सादर , इस जड़ता में चेतनता जागृत करने का एक छोटा सा प्रयास मैंने करने का प्रयोग भर किया है . आगे प्रभु इच्छा . प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

alkargupta1 के द्वारा
December 11, 2012

एफ.डी.आई . सम्बन्धी बहुत अच्छा विश्लेष्णात्मक आलेख है श्री कृष्णश्री जी सोचिये ,समझिये .देखिये फिर लगाइए ,इनकी तरह भागिए मत …..विचारणीय है …

    krishnashri के द्वारा
    December 11, 2012

    आदरणीय महोदया , सादर , आपको आलेख पसंद आया , आपने समय दिया , प्रतिक्रया दी , धन्यवाद .

omdikshit के द्वारा
December 11, 2012

आदरणीय कृष्णा जी, नमस्कार. आप की चिंता ज़ायज है.लेकिन हम भी तो विदेशों में ,…अपना उत्पाद बेचते हैं. यह तो लेन-देन का मामला है.निर्यातको को आयात लाइसेंस लेना ही पड़ता है.जनता को कोई अनिवार्यता नहीं है कि….विदेशी किराना ही खरीदे.आप का विचार भी विचारणीय है.

    krishnashri के द्वारा
    December 11, 2012

    आदरणीय दीक्षित जी , सादर , मैंने वह तमाम स्थितियों का विवेचन किया है जिसमे निवेश आमंत्रित किया जाता है , मेरी समझ से विदेशी किराना अर्थशास्त्र के किसी भी सिद्धांत में फिट नहीं बैठता है . प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 11, 2012

प्रजातंत्र ” की ऐसी दुर्दशा . २०१४ आने वाला है . कमसे कम आप तो वहिष्कार मत करिएगा .सोचिये ,समझिये , देखिये फिर लगाइए , इनकी तरह भागिए मत . कतई नहीं. सादर आदरणीय श्री जी,

    krishnashri के द्वारा
    December 11, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी , सादर , बस यही अलख जगानी है , प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

December 11, 2012

कृष्णा जी बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ,, बहुत दौड लगा ली अब इन भ्रस्ताचारी यों ने साँस फुला दी है ,अब तो जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार होगा ,,,आभार

    krishnashri के द्वारा
    December 11, 2012

    आदरणीय डाक्टर साहब , सादर , आप बिलकुल सही कह रहे हैं ,प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

Santosh Kumar के द्वारा
December 10, 2012

श्रद्धेय ,.सादर प्रणाम क्या लिखूं !!!….प्रजातंत्र बचाने के लिए प्रजा को भागना नहीं जागना होगा ,..एकदिन हम जागेंगे !..सादर आभार वन्देमातरम !

    krishnashri के द्वारा
    December 11, 2012

    स्नेही संतोष जी , सादर , जन जागरण ही अब अंतिम अस्त्र है , स्नेह के लिए धन्यवाद .

jlsingh के द्वारा
December 10, 2012

आदरणीय महोदय, सादर अभिवादन! आपने बहुत अच्छी रचना पेश की है! सुषमा जी और अरुण जेटली जी भी विस्तार से संसद को समझाया था, मुलायम भी मुलायम भाषा में दोतरफा बात कह गए थे … पर हुआ क्या ???? हम तो यही कहते हैं जिस दिन संसद में हंगाम हो संसद ठप्प हो उस दिन का भत्ता काट लिया जाय! पर इसे लागू कौन करेगा? लोकपाल कौन और क्यों बनाएगा? जब हम विकल्प नहीं पैदा कर पा रहे हैं तो रोने से क्या फायदा? जरूरत है सफल विकल्प की मजबूत विपक्ष की … बिकने वाले नेता की नहीं जरूरत है पर यहाँ थोक के भाव में ऐसे ही नेता तैयर हो रहे हैं … उन्हें जीताता कौन है? हम ही लोग न! फिर … सर जी, जरूरत है मजबूत विकल्प पैदा करने की! जरूरत है अच्छे और इमानदार लोगों के राजनीति में आने की! जब तक विकल्प नहीं उभरेगा हम कांग्रेस की मनमानी झेलने को विवश रहेंगे! आभार सहित!

    krishnashri के द्वारा
    December 11, 2012

    आदरणीय सिंह साहब , सादर , आपने विस्तृत रूप से अपनी प्रतिक्रया दी है और मेरी बात को आगे बढाया है ,धन्यवाद .

nishamittal के द्वारा
December 10, 2012

ऍफ़ डी आई का विश्लेषण आपने बहुत अच्छे तरह किया है,श्री कृष्ण जी,जन जागरूकता ही कुछ सुधार ला सकती है.

    krishnashri के द्वारा
    December 11, 2012

    आदरणीय महोदया , सादर , आपने सही सोचा है केवल जागरूकता ही अंतर पैदा कर सकती है , धन्यवाद .


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