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चिंगारी बनी भीषण आग

Posted On: 31 Dec, 2012 में

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टी.वी. विज्ञापन में एक उभरता क्रिकेट खिलाड़ी लड़की पटाने के आसान तरीके बता रहा है . इसी प्रकार जे .जे. पर ज्यादा पठितमें दर्शित लेखों से लोगों की मानसिकता को रेखांकित किया जा सकता है . समाज की सोच , ख़ास कर युवा वर्ग की सोच कम श्रम में या बिना श्रम के अधिक से अधिक हासिल करने की प्रवृति बढ़ती चली जा रही है . दूसरी तरफ महिला वर्ग को शिक्षा की छूट मिलते ही उन्हों ने अधक से अधिक उंचाई तय करने की ठान ली है और वे उंचाई की और अग्रसर होती जा रही हैं . भारतीय समाज को विकास के मापदंडों में उंचा करने का श्रेय इन महिलाओं को दिया जाना उचित होगा . आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलायें आगे बढ़ी हैं और आगे बढ़ रही हैं , यदि यही क्रम रहा तो वे आगे बढ़ती ही जायेगीं . जो भारतीय समाज के लिए एक शुभ संकेत है प्राइवेट कम्पनियां लड़कियों , महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा लेना चाहती हैं क्योंकि उनमे योग्यता भी है और लगन भी , जिससे कंपनी को फ़ायदा ही फ़ायदा होता है . आज नारी शक्ति ने अपनी शक्ति पहचानी है . भारतीय नारी समाज आज सच्चे रूप में उद्वेलित है . अपनी राह ढूंढ़ रहा है अपनी पहचान बनाने को उत्सुक है . एक चिंगारी ने भीषण आग का रूप ले लिया है अब नारी अपने को एक वस्तु मानने को तैयार नहीं है . वह अपनी पहचान पाने को संघर्ष रत है आज भारतीय समाज में पहली बार स्त्री विमर्श इतने विस्तृत एवं सार्थक रूप में जोर पकड़ रहा है . मैं उस चिंगारी को जिसने आज भीषण आग का रूप ले लिया है , नमन करता हूँ और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ .
.
बचपन के झूलों पर,
नदियों के कूलों पर ,
धीरे धीरे बड़ी हुई
शबनमसंग फूलों पर /
.
मम्मी के प्यार में,
पापा के दुलार में ,
इज्जत घर की बनी
इस भरे संसार में /
.
सखियों संग सावन में ,
भैया की बाहों में ,
घूमती ,इठलाती
गाँवों की राहों में /
.
छोटे शहर से आई,
खुशियाँ तमाम छाई ,
स्कुल से कालेज तक
जारी रही पढ़ाई /
.
काली उस रात को ,
अश्रु की बरसात को ,
कैसे भुलाऊं अम्मा
भेड़ियों की बात को /
.
तार -तार आँचल में ,
घर के उस सांकल में ,
कैसे धकुं मैं तन
मम्मी के आँचल में /
.
पंख कटी चिड़िया सी ,
करती रही गुहार ,
कोई कृष्ण आयेगा
सुन कर मेरी पुकार /
.
मैं नववर्ष नहीं मना रहा हूँ अतः किसी को बधाई नहीं दे रहा हूँ . धन्यवाद .

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
January 9, 2013

आदरणीय सर आपकी कविता में घटना की पीड़ा को स्वयं बयान कर रही है. साभार

minujha के द्वारा
January 9, 2013

आदरणीय कृष्णा जी वेदना के चरम को छूती रचना,हार्दिक आभार

seemakanwal के द्वारा
January 5, 2013

आज बहुत से लोग उसी की दोषी ठहरा रहे है और जो लोग पकड़े गयें हैं उनकी कोई सज़ा निश्चित नहीं हो पाई है वो जेल में आराम फरमा रहें हैं उनके लिए फांसी की सज़ा की भी विरोध हो है AAKHIR भारतीय न्यायपालिका है इतनी जल्दी कैसे इंसाफ करेगी .मुझे तो लगता है कुछ नहीं हो पायेगा .दामिनी यूँ ही प्रताड़ित होती रहेंगी .

    krishnashri के द्वारा
    January 7, 2013

    आदरणीय महोदया , सादर , आपकी जिज्ञासा जायज है , परन्तु कुछ न कुछ निष्कर्ष तो निकलेगा ही . प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

nishamittal के द्वारा
January 4, 2013

आपकी मर्मस्पर्शी और यथार्थ पर आधरित सरल रचना को कई बार पढ़ा.काश ! मगरमच्छी आंसूं बहाने वाले नेतागन समझ पाते.

    krishnashri के द्वारा
    January 7, 2013

    आदरणीय महोदया , सादर , आपने समय निकाला ,पढ़ा , अच्छी प्रतिक्रया दी , धन्यवाद .

akraktale के द्वारा
January 3, 2013

काली उस रात को , अश्रु की बरसात को , कैसे भुलाऊं अम्मा भेड़ियों की बात को / . तार -तार आँचल में , घर के उस सांकल में , कैसे धकुं मैं तन मम्मी के आँचल में / . मनोभावों कि सुन्दर अभिव्यक्ति सच है इस बार कोई नया साल नहीं. 

    krishnashri के द्वारा
    January 4, 2013

    आदरणीय रक्ताले जी , सादर , प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

deepasingh के द्वारा
January 3, 2013

वन्दे मातरम कृष्णा जी. बेटी की वर्तमान मई यही पीड़ा है.सुन्दर भावपूर्ण कविता पर बधाई. हमारे ब्लॉग के लिय समय दीजियेगा. http://deepasingh.jagranjunction.com

    krishnashri के द्वारा
    January 4, 2013

    आदरणीय महोदया , सादर , आपने समय दिया ,मेरे ब्लॉग पर प्रथम बार पधारी आपका स्वागत है , धन्यवाद ,

yogi sarswat के द्वारा
January 3, 2013

छोटे शहर से आई, खुशियाँ तमाम छाई , स्कुल से कालेज तक जारी रही पढ़ाई / . काली उस रात को , अश्रु की बरसात को , कैसे भुलाऊं अम्मा भेड़ियों की बात को / . तार -तार आँचल में , घर के उस सांकल में , कैसे धकुं मैं तन मम्मी के आँचल में आखिर में आपने लिखा की मैं नव वर्ष नहीं मन रहा हूँ , मैं भी नहीं मना रहा हूँ इसलिए सिर्फ लोगों की शुभकामनाएं स्वीकार कर रहा हूँ , दे नहीं रहा हूँ ! अब आते हैं आपके विषय पर ! आपने एक आम लड़की की पीड़ा को लिखा है , लोग हमें नाली का कीड़ा कहते हैं ! हम हैं भी ! कोई दोराय नहीं ! लेकिन यही कीड़े चुनाव के समय “भगवान् ‘ हो जाते हैं ! अब इस भगवान् को ये सोचना होगा की भारत किस किस के लिए है ? सिर्फ उनके लिए या हमारे लिए भी ?

    krishnashri के द्वारा
    January 4, 2013

    आदरणीय योगी जी , सादर , आपकी प्रतिक्रया मेरे लिए सदैव एक स्थान रखती है , धन्यवाद .

vinitashukla के द्वारा
January 3, 2013

इस मार्मिक और संवेदनशील रचना हेतु साधुवाद.

    krishnashri के द्वारा
    January 4, 2013

    आदरणीय महोदया , सादर , आपने रचना से तारतम्य बनाया , धन्यवाद .

omdikshit के द्वारा
January 2, 2013

आदरणीय कृष्णा जी, बहुत सुन्दर ज़ज्बात.बधाई.

    krishnashri के द्वारा
    January 4, 2013

    आदरणीय दीक्षित जी , सादर , आपने समय निकाला प्रतिक्रया दी ,धन्यवाद .

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 2, 2013

मर्माहत अंतर्मन की पीड़ा को समझ सकता हूँ ,इस इस संवेदनशील प्रस्तुति के लिए सादर आभार !

    krishnashri के द्वारा
    January 4, 2013

    आदरणीय आचार्य जी , सादर , प्रतिक्रया हेतु आभार , धन्यवाद .

jlsingh के द्वारा
January 1, 2013

पंख कटी चिड़िया सी , करती रही गुहार , कोई कृष्ण आयेगा सुन कर मेरी पुकार . आदरणीय महोदय, नमस्कार! अभी हाल ही में मैंने पढ़ा “उठो द्रौपदी शास्त्र उठा लो अब गोविन्द न आएंगे! ” वेदना की घड़ी है सबको अपनी पड़ी है पर नमन उस जज्बे को इस कंपकंपाती सर्दी में भी अधिकांश युवा जंतर मंतर पर डंटे हैं. मेरा मानना है कुछ बदलाव अवश्य होगा … कुर्बानी बेकार नहीं जायेगी! …सादर!

    krishnashri के द्वारा
    January 4, 2013

    आदरणीय सिंह साहब , सादर , आपने सही कहा कुर्बानी बेकार नहीं जायेगी , बस नेताओं के आचरण का इंतज़ार करिए . धन्यवाद .


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