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पतन की पराकाष्टा

Posted On: 19 Jan, 2013 में

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पृथ्वी बनने के साथ नर और मादा की संरचना हुई .समय- काल, परिस्थिति केअनुसार समाज की रचना हुई .समाज की मुख्य धुरी नर और ,मादा रहे हैं इनके जीवन स्तर को व्यवस्थित रखने हेतु नियम, कायदे, कानून की जरुरत महसूस हुई . बदलाव होते रहे , होते रहे जिसका परिणाम आज के नियम कानून हैं .इनमें भी कमियाँ हैं . समाज बदलाव हेतु करवट बदल रहा है बदलाव होना स्थिति जन्य है , अनिवार्य है . ऐसे ही बदलावों से आज समाज वर्त्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ है . निकट भविष्य में , वर्त्तमान परिस्थिति को देखते हुए ,इसमें और भी बदलाव सन्निकट हैं . बदलते स्वरूप के परिप्रेक्ष्य में बदलाव अपरिहार्य है .नर -नारी जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए बराबर के हिस्सेदार हैं . साथ -साथ चलते हुए कुछ “हूँ -तूँ ” होती रही है , आगे भी होती रहेगी . यही जीवन की मिठास है . साथ -साथ रहने की अनिवार्य शर्त है , एक दुसरे का सम्मान . सम्मान बनाए रखने के लिए जरुरी है एक दुसरे का सहयोग , वह भी बिना किसी भेद भाव के . जैसे परिवार में साहचर्य बनाए रखने के लिए एक दुसरे का सम्मान, सहयोग जरुरी है , उसी प्रकार समाज में भी यह निहायत जरुरी है . परिवार , समाज का ही एक छोटा प्रतिरूप है .कई परिवारों की टूटन एक दिन समाज की टूटन बन जाती है .
दिल्ली में रोंगटे खडा कर देने वाला विभत्स हादसा हुआ . मीडिया जागरुक हुआ , हर जगह के छोटे बड़े हादसों को “ब्रेकिंग न्यूज “प्राप्त हुई . दिल दहल उठा .यह क्या हो रहा है ? हम किधर जा रहे हैं ?दिल्ली हादसे के बाद टी.वी. पर लड़कियों ,महिलाओं के बयान सुन कर भौचक रह गया . लड़कियां कह रही थीं की ,बस में शरीर के ऐसे -ऐसे स्थानों को छुआ(नोचा ) जाता है कि मन क्रोध एवं वितृष्णा से भर उठता है . इच्छा होती है कि एसिड से उन स्थानों को साफ किया जाय. कई -कई दिन तक मन खराब रहता है , दुखी रहता है . ऐसा एक नहीं कई लड़कियों ने कहा . इससे यही परिलक्षित होता है कि यह कोई एक दो घटना नहीं है वरन ऐसा अमूमन हो रहा है . ऐसी घटना का न होना ही अपवाद है .आखिर बस में चलने वाले लडके -आदमी भी तो दिल्ली के ही होंगे . उनकी बहन बेटियाँ भी बस में चलती होंगी .उनके साथ भी ऐसा होता होगा . क्या लड़की होना ही तो अभिशाप नहीं है ?
इसी तरह एक टी.वी.चैनल ने “स्टिंग आपरेशन ” किया जिसमें विभिन्न शहरों में सड़क पर अकेली लड़की को पाकर लोग फब्तियां कस रहे थे , इशारे कर रहे थे , विभिन्न भंगिमाएं बना रहे थे . यह सब देख कर लड़की का बाप होना दुर्भाग्य पूर्ण लगता है . कन्या भ्रूण ह्त्या पर कानून बनाए जा रहे हैं , बनाना भी चाहिए , यह अनैतिक भी है . परन्तु वही कन्या जब लड़की बनती है तो उसकी अस्मत से खेलने वाले गली कुचे से लेकर सार्वजनिक स्थानों तक में मिल जायेंगे . लड़की कहीं भी सुरक्षित नहीं है . लड़कियों की चीत्कार सुन कर कलेजा मुंह को आता है .ये लडके छेड़ने वाले , लूटने वाले कौन हैं ? ये भी हमारे समाज के ही अंग हैं , हममे से ही एक हैं .क्या इसके लिए हम जिम्मेदार नहीं है ?इनकी उच्छ्रिन्खालता एवं अनैतिक कार्यों के लिए क्या ये ही जिम्मेदार हैं ?क्या इनके माँ- बाप ,या समाज जिम्मेदार नहीं है ?
कुछ लोग कपडे कम या छोटा होने को लेकर आपत्ति जताते हैं , कुछ साथ में मर्द के होने की वकालत करते हैं , कुछ अकेले स्थानों पर जाने की मनाहीं करते हैं , परन्तु इधर जीतनी भी घटनाएँ हुई हैं या हो रही हैं या उजागर हो रही हैं उनमें इनका कोई सम्बन्ध नहीं है . दिल्ली में घटना के समय साथ में पुरुष सदस्य था , हिसार में सरे राह , दिन के उजाले में , भरी सड़क पर घटना हुई . उसके बाद आकर बचाने वाले से मार पिट की गई .राबर्ट्सगंज में साथ में पति था . इसी प्रकार हो रही अन्य घटनाएँ मनुष्य के जानवर बनने की गाथा कह रही हैं . एकांगी सोच वाले तमाम दलीलें दे रहे हैं परन्तु समाज में हो रही गिरावट की तरफ किसी का ध्यान नहीं है . जिस तरह डकैत लोंगो की धन संपत्ति लुट लेते हैं तो यह कहा जाय कि पैसे गहने घर पर क्यों रखते हैं बैंक या लाकर में रखिये . उसी तरह लड़की की इज्जत है . उसे घर के बाहर निकलने मत दीजिये , सात तालों में बंद करके रखिये . क्या यह आज के युग में संभव है ? भारत के विकास में आज नारी शक्ति का बहुत बड़ा योगदान है . जी.डी.पी.के आंकड़ों को यदि देखा जाय तो महिलाओं का इसमें बहुत महत्वपूर्ण हाथ नज़र आता है .महिलायें पढ़ लिख कर , बराबरी के साथ , हर क्षेत्र में गरिमापूर्ण ढंग से आगे बढ़ रही हैं , परिवार को एक अच्छी जिंदगी दे रही हैं .फिर इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है ?

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
January 23, 2013

आदरणीय श्रीकृष्णा श्री जी सादर, बिलकुल सही लिखा है आपने मै भी सहमत हूँ आवश्यकता समाज में हर घर में हर व्यक्ति कि सोच में परिवर्तन लाने कि आवश्यकता है. सादर.

shashibhushan1959 के द्वारा
January 20, 2013

आदरणीय कृष्ण श्री जी, सादर ! समाज और सामाजिक मान्यताओं के इस संक्रमण काल की बहुत सही विवेचना आपने की है ! लेकिन इस पश्चिमी सभ्यता के संस्कारों की नक़ल का जो भयावह परिणाम देखने को मिल रहा है, और सत्तासीनों की उदासीनता व क़ानून की ढिलाई से नई पीढ़ी जिस राह पर जा रही है, वह बहुत ही भयावह है ! संयम के बदले कामुकता को बढ़ावा देती हुई समाज की कई धाराएं मुखर होकर इसे बढ़ाने में अपना योगदान कर रही हैं, जो बहुत ही दुखद है ! बहुत सी बातें सोचने को मजबूर करती रचना ! सादर !

    krishnashri के द्वारा
    January 21, 2013

    आदरणीय सिंह साहब , सादर , आपने सहमति दी ,धन्यवाद .

January 20, 2013

सही कहा कृष्णश्री जी आपने हमारे समाज में काफी गिरावट आई है

    krishnashri के द्वारा
    January 21, 2013

    आदरणीय सिन्हा साहब , सादर , आपने सहमति दी ,धन्यवाद .

vinitashukla के द्वारा
January 20, 2013

आदरणीय कृष्णश्री जी, बाहर वालों के अलावा, लड़की के घरवाले ही, उसके साथ जिस प्रकार का सौतेला और अपमानजनक व्यवहार करते हैं- सर्वप्रथम उसका इलाज किया जाना चाहिए. लड़कियों को शादी के बहाने ‘निपटा’ देने और परिवार से बेदखल कर देने का रवैया खत्म होना चाहिए. शादी के नाम पर, लड़के वालों के सामने, बार बार उसकी जो प्रदर्शनी होती है- नितांत अपमानजनक है. कभी उसे चला कर देखा जाता है, कभी बुलवाकर. अभी भी कुछ परिवारों में (खासकर ग्रामीण इलाकों में) उसकी शिक्षा से लेकर, खानपान तक में भेदभाव बरता जाता है. उसके ऊपर ढेरों नैतिक पाबंदियां थोप दी जाती हैं- जिसके बोझ तले दबकर, वह अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार( छेड़खानी, अभद्र टिप्पणियाँ आदि) की शिकायत करते हुए डरती है. इसके चलते ही शोहदों के हौसले बुलंद रहते हैं. बेटी को मजबूत बनाने के लिए, मां- बाप को, उसके प्रति लचीला और परिपक्व रुख अपनाना चाहिए. अफ़सोस- यहाँ नैतिकता और मर्यादा का जिम्मा तो अकेले नारी जाति का ही है; पुरुष छुट्टे सांड की तरह, मंडराते हुए कुछ भी करता फिरे- कोई देखने सुनने वाला नहीं. संवेदनाहीन लोग बसों, सड़कों, बाजारों में लड़कियों पर होने वाले अनाचार को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं. क्या नागरिकों की, समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? गुंडों को पकडवाने के लिए, सरकार की तरफ से इनाम रखा जाना चाहिए और स्रियों की रक्षा करने वाले को सम्मानित किया जाना चाहिए; जिससे खुलेआम छींटाकशी और छेड़खानी पर रोक लग सके. इसके अलावा कार्यालयों/ शिक्षण संस्थानों में भी, महिलाओं पर की जाने वाली अश्लील- अभद्र टिप्पणियों पर रोक लगनी चाहिए. एक समयोचित प्रश्न को उठाती हुई सार्थक, विचारणीय पोस्ट हेतु आभार.

    nishamittal के द्वारा
    January 21, 2013

    आदरनीय श्री कृष्ण जी सहमत हूँ विनीता जी से

    krishnashri के द्वारा
    January 21, 2013

    आदरणीय महोदया सादर , विस्तृत प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद . मैं आपसे सहमत हूँ .

chaatak के द्वारा
January 20, 2013

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, सही कहा आपने- ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान्, जमी न बदली, गगन न बदला, बड़ा गया इंसान, कितना बदल गया इंसान!’ सहमत हूँ कि इंसान बदल नहीं है गिरा है वो भी इतना कि उसे जीवित जीव कहना भी उसकी तारीफ हो जायेगी|

    krishnashri के द्वारा
    January 21, 2013

    आदरणीय चातक जी , सादर , सहमति व्यक्त करने के लिए धन्यवाद .

jlsingh के द्वारा
January 20, 2013

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन! आपने विस्तृत विश्लेषण के साथ अपने विचार रक्खे हैं जो हम सबको, समाज को, सोचने पर मजबूर करती है. हमें ही अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा और इसकी शुरुआत अपने घर से, पड़ोस से करनी होगी. साधुवाद!

    krishnashri के द्वारा
    January 21, 2013

    आदरणीय सिंह साहब , सादर ,सकारात्मक प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .


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