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छोटे बाबू ::एक मशीन

Posted On: 26 Feb, 2013 में

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उठो चार बज गया –
मुन्ना जी !
अभी तुम सोते हो ,
जबकि पहुँचना है
मंजिल पर तेजी से ,
जिंदगी के रास्ते में
समय क्यों खोते हो ?
.
अरे सात बज गया –
मुन्नू की अम्मा क्यों
चुल्हा जला नहीं ,
सब्जी क्या लानी है
चाय तो बनी नहीं /
.
अब समय हो गया
दफ्तर में जाने का ,
खाना अब रहने दो
समय हुआ
सिटी बस आने का /
.
हाय साड़े दस बजा !
छोटे बाबू आप भी
इतनी जल्दी आते हैं
समय तो है बहुत अभी
आफिस को घर पर ही क्यों
लेते नहीं जाते हैं /
.
भला पांच भी बजा –
बेबी की अम्मा ज़रा
पानी दो एक गिलास ,
हाथ है बझा हुआ
पानी है गगरी में
ऊपर गिलास रखी
लेकर के पिलो न /
.
हाय सात बज गया –
सुनते हो
मुझको भी सैंडिल एक
लाला की औरत सा
चल कर खरीद दो
बाटा से /
.
भला नौ भी बजा –
पापा जी यह सवाल
कैसे लगायेंगे ?
देखूं तो कौन सा
मास्टर जी से पूछना ,
छोड़े भी दिन हुआ
अपनी पढाई को /
.
टन -टन बारह बजा –
नीद नहीं आती है
मच्छर के भन -भन से
अरे नहीं
मुन्नू और बेबी की फीस
और राजू के दूध का
किराया मकान का
सब कुछ अभी बाकी है //

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
March 8, 2013

मुन्नू और बेबी की फीस और राजू के दूध का किराया मकान का सब कुछ अभी बाकी है // जीवन की कसमकस को वास्तविक रूप से लेख मई सब्दो का रूप दिया है आपने मुझे बहुत अच्छी लगी आपकी लेखनी !

yogi sarswat के द्वारा
March 1, 2013

भला नौ भी बजा – पापा जी यह सवाल कैसे लगायेंगे ? देखूं तो कौन सा मास्टर जी से पूछना , छोड़े भी दिन हुआ अपनी पढाई को / . टन -टन बारह बजा – नीद नहीं आती है मच्छर के भन -भन से अरे नहीं मुन्नू और बेबी की फीस और राजू के दूध का किराया मकान का सब कुछ अभी बाकी है // पूरे दिन में जीने की कशमकश को सुन्दर ढंग से उकेरा है आपने इस रचना में. बधाई आदरणीय कृष्ण श्री जी.

    krishnashri के द्वारा
    March 1, 2013

    आदरणीय योगी जी , सादर , आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

vinitashukla के द्वारा
March 1, 2013

जीने की कशमकश को सुन्दर ढंग से उकेरा है आपने इस रचना में. बधाई आदरणीय कृष्ण श्री जी.

    krishnashri के द्वारा
    March 1, 2013

    आदरणीय महोदया , सादर , इसी का नाम जिन्दगी है , प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद .

shashi bhushan के द्वारा
February 28, 2013

आदरणीय कृष्ण श्री जी, सादर ! एक औसत नौकरी पेशा व्यक्ति की उलझनों और चिंताओं का यथार्थ चित्रण ! बहुत सुन्दर !

    krishnashri के द्वारा
    March 1, 2013

    आदरणीय शशि भूषण जी , सादर ,उत्साहवर्धन हेतु धन्यवाद .

omdikshit के द्वारा
February 28, 2013

आदरणीय कृष्णा जी, नमस्कार. अस्वस्थता के चलते इधर …जक्शन पर ध्यान नहीं दे सका .इसी का नाम जिंदगी है.बहुत सुन्दर.

    krishnashri के द्वारा
    March 1, 2013

    आदरणीय दीक्षित जी सादर , आप जल्दी स्वस्थ हों यही कामना है प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद .

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 27, 2013

टन -टन बारह बजा – नीद नहीं आती है मच्छर के भन -भन से अरे नहीं मुन्नू और बेबी की फीस और राजू के दूध का किराया मकान का सब कुछ अभी बाकी है // आदरणीय श्री जी सादर अभिवादन जीना इसी का नाम है बधाई सादर

    krishnashri के द्वारा
    February 28, 2013

    आदरणीय कुशवाहा जी , सादर ,कविता के मर्म को समझने के लिए धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
February 27, 2013

कृष्णा श्री जी भागमभाग की जिन्दगी को सुन्दर शब्दों में पिरो कर प्रस्तुत किया है आपने बधाई

    krishnashri के द्वारा
    February 28, 2013

    आदरणीय महोदया , सादर ,भागम भाग भरी जिंदगी ही तो असली जिंदगी है धन्यवाद

akraktale के द्वारा
February 27, 2013

भला पांच भी बजा – बेबी की अम्मा ज़रा पानी दो एक गिलास , हाथ है बझा हुआ पानी है गगरी में ऊपर गिलास रखी लेकर के पिलो न /…………वाह! रोजमर्रा के क्षणों से क्या खूब हास्य चुराया है. और आखिरी बंद ने तो भाव विव्हल कर दिया है. सादर हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय श्रीकृष्णा श्री जी.

    krishnashri के द्वारा
    February 28, 2013

    आदरणीय रक्ताले साहब , सादर ,रचना पसंद करने एवं प्रतिक्रया हेतु आभार आपका , धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
February 27, 2013

महोदय, नमस्कार! एक आदमी की दिनचर्या! बेबसी! मशीन बनाने की!

    krishnashri के द्वारा
    February 28, 2013

    आदरणीय सिंह साहब , सादर ,प्रतिक्रया हेतु आभार आपका , धन्यवाद


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